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आधुनिक भारत

 आधुनिक भारत इक्कीसवीं सदी का भारत पहले की तुलना में बहुत अलग है। आज भारत हर मामलों में विश्व के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है। व्यापार-व्यवसाय से लेकर विज्ञान और खेलकूद के क्षेत्र में भारत विश्वभर में अपनी एक अलग पहचान रखता है। नामी फर्म भारत में निवेश कर लाभ कमा रही है। भारतीय उद्योगों से निर्मित स्वदेशी वस्तुओं की मांग समूचे विश्व में बढ़ी है। हैण्डलूम एवं क्राॅफ्ट की वस्तुओं में भारतीय बाज़ार विशिष्ट पहचान रखते है। खादी के वस्त्रों चाह आज भी वैसी ही बनी हुई है जो महात्मा गांधी के समय थी। आधुनिक परिधानों में खादी को और भी अधिक फैशनबल बनाया गया है।  चिकित्सा- स्वास्थ्य सेवाएं भी पहले से बेहतर हुई है। यहां तक की अच्छी और अन्य देशों से सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं से आकर्षित होकर विदेश में रहने वाले नागरीक भारत आकर उपचार करवाते है। भारतीय आयुर्वेद पहले से अधिक प्रसिद्ध है। आयुर्वेदिक दवाईयों का कारोबार कई गुना बढ़ा है। एम्स जैसे अत्याधुनिक हाॅस्पीटल पुरे भारत के विभिन्न शहरों में सेवायें दे रहे है। आज हमारे पास एक से बढ़कर एक डाॅक्टर्स की टीम है जो भारतीयों को स्वास्थ्य लाभार्भ ...

लेख-तारक मेहता का उल्टा चश्मा

 *लेख* *एकता और भाईचारे की मिशाल-* *तारक मेहता का उल्टा चश्मा*            *तारक* मेहता का उल्टा चश्मा! एक ऐसा धारावाहिक जो रामानंद सागर कृत रामायण और बी आर चौपड़ा की महाभारत के बाद सबसे अधिक देखा और पसंद किया जाने वाला टीवी सीरीयल कहा जा सकता है। तारक मेहता का उल्टा चश्मा की नायिका छरहरी काया की छोटे कपड़े पहनने वाली तेज-तरार मुहंफट युवती नहीं है। जैसा आम सीरियल में होता है। दया बेन समाज की उस भोली-भाली बहू का प्रतिनिधित्व करती है जिसे हम अक्सर अपने आसपास देख सकते है। परमार्थ की भावना से परिपूर्ण दया बेन लटके-झटके नहीं दिखाती। वरन अपने गुजराती संस्कार पर गर्व करते हुये सादा जीवन जीते हुये नित्य नये आदर्श प्रस्तुत करती है। तारक मेहता का उल्टा का नायक जेठालाल गढ़ा, कोई सिक्स पैक वाला गबरू जवान नहीं है। वह तो कद में छोटा और मोटा है। उसके चेहरे पर कोई विशेष तेज नहीं है वरन चार्ली चैंपियन की तरह बहुत छोटी मूंछ है। जिसे देखकर बरबस ही हंसी आ जाती है। जेठालाल की मुसीबतों में फंसने की कहानियां नई नहीं है। वे तो दर्शकों ने बहुत बार देखी-सुनी तथा आजमाई हुई है, स्...

इंदौरी- व्यंग्य

       *इंदौरी-व्यंग्य*        *हमारे* इंदौर में तो इतने जागरूक लोग पाये जाते है कि यदि एम वाए अस्पताल में किसी मरीज से मिलने गये तो स्वयं से कहते है- 'जब एमवाए आ ही ग्या है तो अपणा भी चेकअप करई ला।' पांच रूपये की पर्ची पर पूरे पांच सौ रूपयू की दवाई मुफ्त में लेते आयेंगे। डाॅक्टर को झूठ-झूठ बोलकर फ्री में जांचें लिखवा लेंगे और इसके बाद बोलेंगे- 'डाॅक्टर साबह! म्हारें बड़े छोरा के खुजली चली री है। उके लाने भी दवाई दी दो।' हमारे इंदौरी डाॅक्टर बुरा नहीं मानते और मरीज को दवा दे देते है। कुछ इंदौरी तो इतने महान है, जो दिन भर कुछ नहीं करते लेकिन जरा भर काम का बोलो तो कहते है-'टाइम नी है अपने पास!' अच्छा यह वही लोग है जो दिनभर भोजन- भंडारें की तलाश में मोहल्लें-मोहल्लें भटकेगें और पहले स्वयं भरपेट जीमेंगे, जेब में जहां-जहां रखने की जगह होगी भोजन के पैकेट ठूंस लेंगे। घर लौटते ही सबसे पहले भोजन के पैकेट सुरक्षित रखकर मोहल्ले के अन्य घरों में डोंढी पीट देंगे की फलां जगह भोजन के पैकेट बंट रहे है। एहसान जताना भी नहीं भूलेंगे। कहेंगे-'म्हारे जैसे ही पतो चलियो...

कवि का शुभकामना संदेश

         *कवि का शुभकामना संदेश-व्यंग्य*    *शादी* की रिशेप्सन पार्टी के दौरान स्टेज पर खड़े दुल्हा-दुल्हन को बधाई देने एक कवि मित्र पहूंचे। दुल्हे मित्र के कंधे पर हाथ रखकर कवि जी बोले- "होनी को कोन टाल सकता है मित्र! किन्तु तुम ध्यैर्य से काम लेना। अब तक तुमने पढ़ाई और नौकरी आदि के लिए जो संघर्ष किया है वो तो नाम मात्र का था। तुम्हारा वास्तविक संघर्ष तो अब शुरू होता है। मैं ईश्वर से तुम्हारी सलामती के लिए प्रार्थना करूंगा। ईश्वर तुम्हारी रक्षा करें।" कवि मित्र का गला भर आया। उनके चेहरे की रूआंसी में उनके निजी अनुभव साफ देखे जा सकते थे। वे दुल्हन से कुछ न बोले। बस हाथ जोड़कर कुछ पल दुल्हन के सम्मुख खड़े रहे। मानो जैसे आंखों में नीर भरकर अपने प्रिय दुल्हे मित्र पर कृपा बनायें रखने की अपील कर रहे हो। स्टेज से उतरकर वे सीधे साऊण्ड सिस्टम वाले के पास जा पहूंचे। न जाने कवि जी ने उसके कान में क्या कहा, जिसे सुनकर वह घबरा गया और ना-नुकर करने लगा। कवि मित्र कहां मानने वाले थे। जेब से मोबाइल निकाला और साऊण्ड सिस्टम से अटेच कर दिया। फिर जो गीत बजा उसने उपस्थित ...

एक ऐसा कवि सम्मेलन भी

 *प्रकाशनार्थ* *व्यंग्य* *एक ऐसा भी कवि सम्मेलन*        *एक* कवि मित्र को जब स्व संयोजन के कवि सम्मेलन में नहीं  बुलाया तब शुरु में वे कुछ नहीं बोले, बल्कि बधाई और शुभकामनाएं देने की औपचारिकता निभाने में सबसे आगे थे। इतना ही नहीं बे-मन से हमारे कवि सम्मेलन का प्रचार-प्रसार भी करते नज़र आये। बाद में पता चला कि उन्होंने कवि सम्मेलन का प्रचार-प्रसार इतना व्यापक और जोरदार किया था कि तय तिथि पर सात गांव के बच्चें, बूढ़ें और जवान स्त्री-पुरुष हजारों की संख्या में मंच के निकट आ पहूंचे।         कवि सम्मेलन बहुत अच्छा चल रहा था किन्तु थोड़े ही समय में शांत और भूखी बैठी जनता का ध्यैर्य जवाब दे गया। उनमें से कुछ तो बोल पड़े की भोजन की व्यवस्था कहा है?आयोजक-प्रायोजक हैरत में पड़ गये। इतने लोगों को भोजन करवाना संभव नहीं था और वैसे भी यह कवि सम्मेलन का आयोजन था न कि शादी-ब्याह का। और यही बात आयोजक समिति के लोगों ने जनता से कही। इतना सुनकर जनता बे-काबू हो गयी। कुछ बोले की हम यहां कवि सम्मेलन सुनने थोड़े ही आये है, हमें तो भोजन-भंडारा के लिए आमंत्रित कि...

कवि बन जाएं श्रौता तो....

 *कवि बन जाएं श्रौता तो....!* (जितेन्द्र शिवहरे)         *कवि* सम्मेलन के समापन पर पहले कवि से पूछा गया- 'आपका प्रदर्शन कैसा रहा?' अति उत्साह में भरकर वे बोले कि 'मेरा तो शानदार था, दूसरों की नहीं कह सकता।' एक अन्य कवि ने भी वही उत्तर दिया जो पहले ने दिया था। तीसरे, चौथे और पांचवे के उत्तर भी एक समान थे। छटवें नम्बर के कवि मुझे आशा भरी नज़रों से देख रहे थे। ज्यों ही मैं आगे बढ़ा त्यों ही मुझसे बोले-'क्यों जी! सभी से कार्य प्रदर्शन पूछ लिया। हमसे क्यों नहीं?' मैं तपाक से बोला- 'कोई अर्थ नहीं! आप भी वही कहोगे जो अन्य ने कहा।' तब कवि जी बोले- 'ऐसा नहीं है! मैं अपने साथ इन सभी कवियों का भी हाल बता सकता हूं।' मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। उत्सुकतावश उनसे भी काव्यपाठ कैसा रहा, पूछ लिया। वे कविश्वर कुछ देर चूप होकर बोले- 'एक मात्र मैं ही ऐसा कवि था जिसने कल रात मंच पर सभी कवियों को सुना। इतना ही नहीं! जीवन में पहली बार मुझे कविता पढ़ने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ।' मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी। वे मेरी मनःस्थिति समझ चूके थे। वे आगे बोले- 'मंच पर क...

साहित्य में स्टारडम

 *लेख प्रकाशनार्थ* *साहित्य में स्टारडम महज़ कुछ लोगों के पास*      *सोशल* मीडीया जगत ने कवि और गीतकारों की ऐसी बाढ़ ला दी कि संभाले नहीं संभल रही। जो कुछ नहीं कर रहा, वह आज कविता कर है। दैनिक कार्य करने के बाद जितना भी समय बचा, रचनाकार तुरंत स्व रचना सृजित करने में व्यस्त हो जाता है। यूट्यूब, फेसबुक देख-देखकर कितने ही श़ायर और कवि अपनी प्रतिभा दिखाने को बेताब है। अवसर भर मिलने की देर है। जहां भी काव्य की महफिल जमती, नवांकुर बेधड़क वहां पहूंच जाते है। बहुत कुछ लिखा जा रहा है, बहुत कुछ मंचों पर पढ़ा भी जा रहा है और सिर्फ इस उद्देश्य के साथ की जल्दी से जल्दी कुमार विश्वास और स्व. राहत इंदौरी सरीखी की स्टारडम हासिल हो जाएं।       काव्य की महफिलें भी अब राजनीति से अछुति नहीं रही। बड़े मंचों पर पहूंचना अब आसान नहीं रहा। क्योंकि अच्छा लिखने-पढ़ने वाले कम नहीं है। दिग्गज कवि-श़ायर अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं है। मीडिया जगत भी इन्हीं के आसपास बना रहता है। फलतः बड़े-बूढ़े ही चर्चा में बने रहते है। बड़े और समृद्ध आयोजन गिने-चुने साहित्यकारों की ही झोली में बरस...