कवि बन जाएं श्रौता तो....

 *कवि बन जाएं श्रौता तो....!*


(जितेन्द्र शिवहरे)


        *कवि* सम्मेलन के समापन पर पहले कवि से पूछा गया- 'आपका प्रदर्शन कैसा रहा?' अति उत्साह में भरकर वे बोले कि 'मेरा तो शानदार था, दूसरों की नहीं कह सकता।' एक अन्य कवि ने भी वही उत्तर दिया जो पहले ने दिया था। तीसरे, चौथे और पांचवे के उत्तर भी एक समान थे। छटवें नम्बर के कवि मुझे आशा भरी नज़रों से देख रहे थे। ज्यों ही मैं आगे बढ़ा त्यों ही मुझसे बोले-'क्यों जी! सभी से कार्य प्रदर्शन पूछ लिया। हमसे क्यों नहीं?' मैं तपाक से बोला- 'कोई अर्थ नहीं! आप भी वही कहोगे जो अन्य ने कहा।' तब कवि जी बोले- 'ऐसा नहीं है! मैं अपने साथ इन सभी कवियों का भी हाल बता सकता हूं।' मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। उत्सुकतावश उनसे भी काव्यपाठ कैसा रहा, पूछ लिया। वे कविश्वर कुछ देर चूप होकर बोले- 'एक मात्र मैं ही ऐसा कवि था जिसने कल रात मंच पर सभी कवियों को सुना। इतना ही नहीं! जीवन में पहली बार मुझे कविता पढ़ने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ।' मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी। वे मेरी मनःस्थिति समझ चूके थे। वे आगे बोले- 'मंच पर कवियों की संख्या कम थी। मांत्र पांच कवि ही न्यूनतम मानेदय के भूगतना पर आ सके थे। शेष दो कवियों ने आने से मना कर दिया था। चतुर संयोजक ने मुझे मोदी जैकेट पहनाकर मंच पर बैठा दिया ताकि कोरम बना रहे। मेरे हाथों में कागज का पन्ना थमाकर संयोजक बोले कि जब मेरा नाम पुकारा जाये, मंच पर खड़े होकर कागज पर लिखी कविता पढ़कर सुना देना।' मैं थोड़ा गुस्से में आ गया। 'इसका अर्थ तुम कवि नहीं हो?' मैंने आगे पूछा। 'कौन कहता है? सुनने से अधिक कविता सुनाने वाले लोग है यहां। और मैंने तो बकायदा आज मंच से कविता पाठ किया है।' वह बोला। 'तुम मंच के पास क्या कर रहे थे?' मैंने पूछा। वह बोला- 'मैं माइक-साऊण्ड वाला हूं।' मुझे माजरा समझ में आ गया। आगे पूछा - 'तुमने कविता पाठ और साऊण्ड सिस्टम दोनों एकसाथ कैसे संभाला?' 'आप तो ऐसे पूछ रहे है जैसे वहां कोई श्रौताओं का मेला भरा था। ऊंगलियों पर गिन लो इतने लोग थे।' वह बोले। मेरे चेहरे के भाव वह समझ गये। आगे बोले- 'एक वो टेन्ट हाऊस वाला लड़का था जो जागते हुये इसलिए बीड़ी फूंक रहा था कि कहीं मानेदय मिलने या कम मिलने पर कविगण आपस में झगड़ा न शुरू कर दे। उसे अपने रचाई और चद्दर की परवाह रातभर जगाये हुये थी। दूसरा वह नगर का चौकीदार, जिसे बड़े दिनों बाद सीटी नहीं बजाने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। तिसरा आयोजक था, जिसकी मजबूरी थी रात काली करने की।' उनकी बातें सुनकर कवि होने के नाते मैं स्वयं भी शर्म का अनुभव कर रहा था। 'क्या इनके अलावा वहां कोई और नहीं था?' मैंने आगे पूछा। 'था न! वहां पांडाल के इर्द-गिर्द तीन-चार कुत्तें काव्य पाठ का आनन्द बड़े शौक़ से ले रहे थे।' इतना सुनकर मुझे कुछ और सुनना शेष नहीं था। बरबस ही अपने कानों पर हाथ चले गये। स्थिति विचारणीय है। वह कवि सम्मेलन जिसे श्रौता रातभर सड़कों पर जम़ीन पर बैठकर सुना करते थे। कविताओं के दो और कभी-कभी श्रौताओं की मांग पर तीन-तीन दौर हुआ करते थे। वहीं आज के कवि सम्मेलन में रात के ग्यारह बजते ही श्रौता घर लौटने लगते है। जबकी कविता का क्रेज़ घटने के बजाये बेतहाशा बढ़ा है। आज हर दूसरा-तिसरा व्यक्ति कविता लिख रहा है और चाहता हे कि वह भी काव्य मंचों से काव्यपाठ करें। प्रारंभिक सुझाव इतना तो अवश्य दिया जा सकता है कि जो कवि मंच पर है उन्हें अन्य कविगणों का सानिध्य श्रौताओं के रूप में मिलें और जब अन्य मंच पर श्रौता बने कवि मंच पर काव्य पाठ करने पहुंचें तब पुर्व मंचीय कवि श्रौताओं के रूप में तात्कालिक कवियों का मनोबल बढ़ाते हुये नज़र आये। यह क्रम चलता रहना चाहिये। तब शायद कवि सम्मेलन की गौरवशाली परंपरा पुनर्जीवित होकर प्रसिद्धी के नये आयाम खड़े करने में कामयाब हो सके।


सर्वाधिकार सुरक्षित 

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जितेन्द्र शिवहरे (कवि/शिक्षक)

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