साहित्य में स्टारडम
*लेख प्रकाशनार्थ*
*साहित्य में स्टारडम महज़ कुछ लोगों के पास*
*सोशल* मीडीया जगत ने कवि और गीतकारों की ऐसी बाढ़ ला दी कि संभाले नहीं संभल रही। जो कुछ नहीं कर रहा, वह आज कविता कर है। दैनिक कार्य करने के बाद जितना भी समय बचा, रचनाकार तुरंत स्व रचना सृजित करने में व्यस्त हो जाता है। यूट्यूब, फेसबुक देख-देखकर कितने ही श़ायर और कवि अपनी प्रतिभा दिखाने को बेताब है। अवसर भर मिलने की देर है। जहां भी काव्य की महफिल जमती, नवांकुर बेधड़क वहां पहूंच जाते है। बहुत कुछ लिखा जा रहा है, बहुत कुछ मंचों पर पढ़ा भी जा रहा है और सिर्फ इस उद्देश्य के साथ की जल्दी से जल्दी कुमार विश्वास और स्व. राहत इंदौरी सरीखी की स्टारडम हासिल हो जाएं।
काव्य की महफिलें भी अब राजनीति से अछुति नहीं रही। बड़े मंचों पर पहूंचना अब आसान नहीं रहा। क्योंकि अच्छा लिखने-पढ़ने वाले कम नहीं है। दिग्गज कवि-श़ायर अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं है। मीडिया जगत भी इन्हीं के आसपास बना रहता है। फलतः बड़े-बूढ़े ही चर्चा में बने रहते है। बड़े और समृद्ध आयोजन गिने-चुने साहित्यकारों की ही झोली में बरसों से गिरते आ रहे है। होली, दिवाली जैसे धार्मिक त्यौहारों पर भी सीनियर कवि ही टीवी पर कविता पढ़ते नज़र आते है। दूरदर्शन और आकाशवाणी में काव्यपाठ करने का अर्थ नवोदितों के लिए सोशल मीडिया पर मात्र फोटो अपलोड करना भर है। दिल्ली के लाल किले से काव्यपाठ करने का सपना संजाये बैठे लाखों कवि-श़ायरों के लिए दिल्ली दूर ही नहीं वरन बहूत दूर है। यह कहना गल़त नहीं होगा की आज साहित्य में स्टारडम मात्र कुछ लोगों तक ही सीमित है। या यूं कहे कि वर्तमान के प्रसिद्ध कवि और श़ायर आज साहित्य की धूरी है जिनके आसपास असंख्य रचनाकार इस आशा में चक्कर लगाते है कि शायद वरिष्ठ साहित्यकार उन्हें थोड़े अवसर उपलब्ध कराये! जिससे की वे भी नाम और दाम दोनों कमा सके। खैर! ये आशान्वित सोच तो सभी रखते है। किसी की आशा पूरी होती है किसी की अधूरी रह जाती है। इन सबके बाद भी रचनाकार आशातित होकर निरंतर साहित्य स्टार बनने की जुगत में लगा है। आज नहीं तो कल उसके सपने पूरे होंगे! इसी विचार में लाखों कवि-श़ायर बड़े साहित्यिक नामों के फैन बने बैठे है। देखते है यहां किस-किस को अपनी मंजिल मिलती है।
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लेखक
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जितेन्द्र शिवहरे
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