एक ऐसा कवि सम्मेलन भी
*प्रकाशनार्थ*
*व्यंग्य*
*एक ऐसा भी कवि सम्मेलन*
*एक* कवि मित्र को जब स्व संयोजन के कवि सम्मेलन में नहीं बुलाया तब शुरु में वे कुछ नहीं बोले, बल्कि बधाई और शुभकामनाएं देने की औपचारिकता निभाने में सबसे आगे थे। इतना ही नहीं बे-मन से हमारे कवि सम्मेलन का प्रचार-प्रसार भी करते नज़र आये। बाद में पता चला कि उन्होंने कवि सम्मेलन का प्रचार-प्रसार इतना व्यापक और जोरदार किया था कि तय तिथि पर सात गांव के बच्चें, बूढ़ें और जवान स्त्री-पुरुष हजारों की संख्या में मंच के निकट आ पहूंचे।
कवि सम्मेलन बहुत अच्छा चल रहा था किन्तु थोड़े ही समय में शांत और भूखी बैठी जनता का ध्यैर्य जवाब दे गया। उनमें से कुछ तो बोल पड़े की भोजन की व्यवस्था कहा है?आयोजक-प्रायोजक हैरत में पड़ गये। इतने लोगों को भोजन करवाना संभव नहीं था और वैसे भी यह कवि सम्मेलन का आयोजन था न कि शादी-ब्याह का। और यही बात आयोजक समिति के लोगों ने जनता से कही। इतना सुनकर जनता बे-काबू हो गयी। कुछ बोले की हम यहां कवि सम्मेलन सुनने थोड़े ही आये है, हमें तो भोजन-भंडारा के लिए आमंत्रित किया गया था और हम खाना खाये बगैर यहाँ से नहीं जायेंगे।
कविगण मंच से उठ खड़े हूये और बिना काव्य पाठ किये उल्टे पैर भागने की जगह तलाशने लगे। मैं स्वयं संकरी गली ढूंढ रहा था। वह कवि मित्र मुझे सिर से गले तक फंसा कर दूर खड़े यह सब देख मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। धूर्त ने बकायदा वाहन में साऊंण रेडियो लगवाकर सात दिनों तक गांव-गांव और शहर-शहर हमारे इस कवि सम्मेलन का पर्याप्त प्रचार-प्रसार किया था। उन्होंने अपनी तेजस्वी वाणी में भंडारे में पधारने की अपील वाली रिकार्डिंग प्रचार वाहन में चलवा दी। जिसमें कहा गया था कि कवि सम्मेलन के पुर्व भव्य भोजन भंडारें का आयोजन होगा जिसमे छप्पन भोग के पकवान परोसे जायेंगे। अतः अधिक से अधिक संख्या में पधारकर कवि सम्मेलन और भोजन भंडारें को सफल बनाने की कृपा करें। निवेदक- आयोजक जितेन्द्र शिवहरे जुगनू एवं भंडारा समिति समिति प्रमुख....!
समाप्त
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