इंदौरी- व्यंग्य
*इंदौरी-व्यंग्य*
*हमारे* इंदौर में तो इतने जागरूक लोग पाये जाते है कि यदि एम वाए अस्पताल में किसी मरीज से मिलने गये तो स्वयं से कहते है- 'जब एमवाए आ ही ग्या है तो अपणा भी चेकअप करई ला।' पांच रूपये की पर्ची पर पूरे पांच सौ रूपयू की दवाई मुफ्त में लेते आयेंगे। डाॅक्टर को झूठ-झूठ बोलकर फ्री में जांचें लिखवा लेंगे और इसके बाद बोलेंगे- 'डाॅक्टर साबह! म्हारें बड़े छोरा के खुजली चली री है। उके लाने भी दवाई दी दो।' हमारे इंदौरी डाॅक्टर बुरा नहीं मानते और मरीज को दवा दे देते है। कुछ इंदौरी तो इतने महान है, जो दिन भर कुछ नहीं करते लेकिन जरा भर काम का बोलो तो कहते है-'टाइम नी है अपने पास!' अच्छा यह वही लोग है जो दिनभर भोजन- भंडारें की तलाश में मोहल्लें-मोहल्लें भटकेगें और पहले स्वयं भरपेट जीमेंगे, जेब में जहां-जहां रखने की जगह होगी भोजन के पैकेट ठूंस लेंगे। घर लौटते ही सबसे पहले भोजन के पैकेट सुरक्षित रखकर मोहल्ले के अन्य घरों में डोंढी पीट देंगे की फलां जगह भोजन के पैकेट बंट रहे है। एहसान जताना भी नहीं भूलेंगे। कहेंगे-'म्हारे जैसे ही पतो चलियो मैं तमारे कैणे आई ग्यो। म्हने जीमणा तो दूर चखीयों तक नी है।' और यह एहसान इसलिए करते है ताकी भंडारें में पुनः अकेले जाने पर कोई इन्हें पहचान न लें। इसलिए मोहल्ले की भीड़ के साथ भंडारे में दाखिल होते है। कुछ तो भोजन के पैकेट की खेप तब तक घर भेजते रहेगें जब की भंडारे वाला मार-मार के भगा न दें या फिर भोजन खत्म न हो जाये तब तक।
ये तो कुछ बी नी। दूसरों की मोटरसाइकिल मांगकर, उसमें बीस का पेट्रोल डलवाने इंदौरी युवा कहता है कि मुझे तो पल्सर के नीचे कोई बाइक जमती ही नी हैं। अच्छा! लड़कीयां इन युवाओं के मुंह को देखती तक नहीं, लेकिन चेहरे पर दाढ़ी ऐसी रखेंगे मानो सबसे ज्यादा स्टाइलिश तो एक बस यही है।
इंदौर में ज्ञानी-ध्यानी तो इतने भरे पड़े है की ट्रक भर-भर के भी समुंद्र में फेंके तो भी नगर पालिका को दो-तीन साल लग जायें। दूसरों के काम में जबरन दखल देने वाले भी यहाँ कम नहीं है। 'ये ऐसा क्यों किया?' 'ऐसा तो नहीं करना चाहिये था।' 'या ऐसा करते तो अच्छा होता।' और तो और ठीठ लोगों की भी सुन लो। कुछ तो इतने ठीठ होते है जो एक बार बस या ट्रेन की सीट पर बैठ गये, बस! समझो! बस और ट्रेन की सीट अपने पिताजी की समझ लेते है। मजाल है कोई जरा भर इनकी सीट पर सटकर खड़ा हो जाये। तुरंत लपककर कहेंगे- 'कहां चढ़े जा रहे बे। दूर हट मुझे गर्मी हो री है।'
अपने यहां के मजदूर टीन शेड की बैठक व्यवस्था छोड़कर चलती सड़क पर राहगीरों को रोककर पूंछते नज़र आयेंगे- 'कोई काम हो तो बताओ! सस्ते में निपट जाओगो।' और अगर कोई गलती से चौराहे के मजदूर को घर के काम पर ले आया तो समझो उसने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल कर ली। मजदूर काम की जगह पहूंचते ही बोलेंगे- 'चाय नाश्ता तो करवाओ। पूरा दिन क्या भूखों रखोगे।' मजबूरन चाय नाश्ता करवाना पड़ता है। फिर ये बीड़ी फूंकने लग जायेंगे। बड़ी मुश्किल से 11 बजे काम शुरू करेंगे और 1 बजे पुनः भोजनावकाश मांग बैंठेंगे। भारी काम नहीं करेंगे। सीधा और सरल काम करते दिखेंगे। पांच बजते ही हाथ धो लेंगे और मालिक से मजदूरी के रूपये मांगेगे। सौ-पचास रूपये अधिक की याचना करते हुये भी नज़र आयेंगे। दुबारा बुलाने की प्रार्थना करते हुये जो सामान जहा पड़ा है वही रखकर ऐसे भागेंगे की ढूंढे से नहीं मिलेंगे। विवशता में मकान मालिक को बिखरा सामान सहेजना पड़ता है।
मैं तो और भी बहुत से नयी-नयी किश्म के इंदौरीयों को जानता हूं...! फुर्सत में उनके विषय में भी बताऊंगा...! अभी के लिए इतना ही..!
जितेन्द्र शिवहरे
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